रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की दो दिवसीय भारत यात्रा न केवल भारत-रूस के ऐतिहासिक संबंधों को मजबूत करने का अवसर है, बल्कि वैश्विक भू-राजनीति में एक स्पष्ट संदेश भी। चार साल बाद भारत लौटे पुतिन का यह दौरा, जब यूक्रेन युद्ध की छाया और अमेरिकी दबाव के बीच हो रहा है, दुनिया को भारत की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ की याद दिलाता है। पश्चिमी देशों की चिंताओं के बीच यह यात्रा एक ऐसे साझेदार को मजबूत करती है, जो भारत के लिए ऊर्जा, रक्षा और आर्थिक सुरक्षा का स्तंभ बना हुआ है। लेकिन क्या यह यात्रा वैश्विक संतुलन को नया मोड़ देगी, या सिर्फ पुरानी दोस्ती का पुनरुद्धार साबित होगी?
पुतिन का यह दौरा 23वें भारत-रूस वार्षिक शिखर सम्मेलन के लिए है, जहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ द्विपक्षीय वार्ता होगी। एस-400 मिसाइल प्रणाली के अतिरिक्त रेजिमेंट, सु-57 लड़ाकू विमानों की खरीद, और ब्रह्मोस मिसाइल के निर्यात पर चर्चा। ऊर्जा क्षेत्र में रूस डिस्काउंटेड तेल और गैस की आपूर्ति बढ़ाने पर जोर दे रहा है, जबकि व्यापार लक्ष्य 2030 तक 100 अरब डॉलर का है। रूसी विशेषज्ञों के अनुसार, यह यात्रा साबित करती है कि पश्चिम के सभी प्रयास भारत-रूस संबंधों को तोड़ने में नाकाम रहे। भारत ने अक्टूबर में ही 2.5 अरब यूरो मूल्य का रूसी तेल आयात किया, जो अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद जारी है।
दुनिया की नजरें इस यात्रा पर टिकी हैं, और प्रतिक्रियाएं मिश्रित हैं। पश्चिमी मीडिया और राजनयिकों में चिंता का माहौल है। न्यूयॉर्क टाइम्स ने इसे ‘ट्रंप प्रशासन की निगरानी में पुतिन-मोदी वार्ता’ करार दिया, जहां अमेरिका भारत पर रूस से तेल खरीद को सीमित करने का दबाव डाल रहा है। ब्रिटेन, फ्रांस और जर्मनी के राजदूतों ने संयुक्त संपादकीय में पुतिन को यूक्रेन युद्ध का जिम्मेदार ठहराते हुए भारत से अपील की कि वह ‘युद्ध समाप्त करने वाले नेता’ के रूप में पुतिन पर दबाव डाले। अल जazeera की रिपोर्ट में कहा गया कि यह यात्रा यूक्रेन शांति प्रयासों के बीच हो रही है, जहां रूस द्विपक्षीय व्यापार बढ़ाने पर तुला है। गार्जियन ने इसे ‘राजनीतिक रूप से खतरनाक समय’ में मोदी-पुतिन की मुलाकात बताया, जहां दोनों देश ट्रंप के अमेरिका और शक्तिशाली चीन से निपटने के लिए एक-दूसरे की जरूरत महसूस कर रहे हैं।
दूसरी ओर, वैश्विक विश्लेषकों में भारत की बहुपक्षीय नीति की सराहना हो रही है। सीएनएन ने सवाल उठाया कि क्या भारत मॉस्को और वाशिंगटन दोनों के साथ अच्छे संबंध बनाए रख सकता है? रॉयटर्स के अनुसार, पुतिन भारत को रूसी तेल, मिसाइल और जेट बेचने के लिए जोर दे रहे हैं, जो अमेरिकी दबाव से प्रभावित हुए हैं। मॉडर्न डिप्लोमेसी ने चेतावनी दी कि यह यात्रा पश्चिमी राजधानियों में चिंता बढ़ाएगी, क्योंकि नई दिल्ली मॉस्को की ओर झुकाव दिखा रही है। एक्स पर बहस गर्म है – एक यूजर ने इसे ‘पश्चिमी मेल्टडाउन’ कहा, जहां भारत रूस के साथ एस-500 मिसाइल और रेलॉस सैन्य लॉजिस्टिक्स समझौते पर चर्चा कर सकता है, जो पहली बार किसी गैर-अमेरिकी ब्लॉक देश को भारतीय नौसैनिक और हवाई अड्डों तक पहुंच देगा।
रूस भारत का सबसे बड़ा रक्षा आपूर्तिकर्ता है, और ब्रिक्स जैसे मंचों पर सहयोग बढ़ रहा है। पूर्व राजनयिक अनिल त्रिगुणायत ने इसे ‘उत्पादक और महत्वपूर्ण’ बताया, जहां ऊर्जा, व्यापार और वैश्विक मुद्दों पर बात होगी। लेकिन चुनौतियां कम नहीं: अमेरिकी सीएएटीएसए प्रतिबंधों का खतरा, यूक्रेन युद्ध पर भारत की तटस्थता, और चीन के साथ रूस के बढ़ते संबंध भारत के लिए चिंता का विषय हैं। वैश्विक नजरिए से देखें तो यह यात्रा बहुपक्षीय दुनिया का आईना है। पुतिन की यात्रा रूस की अलगाव की जंजीर तोड़ती है, जबकि भारत अपनी स्वतंत्र विदेश नीति को मजबूत करता है। पश्चिम इसे ‘चिंताजनक’ कह सकता है, लेकिन वास्तव में यह एक उभरती महाशक्ति का आत्मविश्वास दर्शाता है – जो न तो किसी के ‘जूनियर पार्टनर’ बनेगा, न ही द्विपक्षीय दबाव में झुकेगा। यदि एस-400 और सु-57 जैसे सौदे फाइनल होते हैं, तो यह न केवल भारत की सुरक्षा मजबूत करेगा, बल्कि वैश्विक शक्ति संतुलन में नया अध्याय लिखेगा। दुनिया को अब यह स्वीकार करना होगा कि भारत का ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ कोई दिखावा नहीं, बल्कि रणनीतिक आवश्यकता है।
– राजेश राठौर
संपदक, गुजरात न्यूज़ पोस्ट