गुजरात राज्य की स्थापना के साथ ही यहां शराबबंदी लागू है। महात्मा गांधी की भूमि होने के कारण इस नीति को राज्य की नैतिक पहचान माना जाता है। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में शराब की तस्करी, जहरीली शराब से होने वाली मौतें और बूटलेगर्स की गिरफ्तारियों के समाचार इतने बढ़ गए हैं कि लगता है गुजरात में शराबबंदी नहीं, बल्कि “शराब की खुली छूट” चल रही हो ऐसा लग रहा है। कानून कागज पर है, धरती पर उसका कोई अस्तित्व नहीं।
हर रोज़ सरहदों से ट्रक भर-भर कर शराब आती है। दाहोद, वलसाड, सूरत, अहमदाबाद हर जिले में पुलिस की नाक के नीचे गोदाम भरते हैं, बिक्री होती है और लाखों करोड़ों का काला कारोबार चलता है। इतना ही नहीं, जहरीली शराब से हर साल दर्जनों लोग मरते हैं। 2024-25 में भी मेहसाणा, सुरेंद्रनगर, गांधीनगर में ऐसी घटनाएं हुईं। ये सब साबित करता है कि शराबबंदी अब एक असफल नीति बन चुकी है।
इस असफलता के पीछे तीन मुख्य कारण हैं। पहला ये की भ्रष्टाचार। पुलिस, आबकारी विभाग और स्थानीय राजनेताओं का आशीर्वाद मिले बिना इतना बड़ा धंधा चल ही नहीं सकता। हर महीने “हफ्ता” देकर बूटलेगर बेफिक्र होकर कारोबार करते हैं। छापे पड़ते हैं तो छोटी मछलियां पकड़ी जाती हैं, बड़े मगरमच्छ बच निकलते हैं। इसी का ताज़ा उदाहरण जिग्नेश मेवानी की हालिया घटना है। 22 नवंबर 2025 को वाव-थराड जिले के धीमा गांव में कांग्रेस की जन आक्रोश यात्रा के दौरान मेवानी ने पुलिस पर शराब और ड्रग्स के धंधे पर कार्रवाई न करने का आरोप लगाया और कहा कि भ्रष्ट पुलिस अधिकारियों के पट्टे (बैज और बेल्ट ) उतार देने चाहिए। इससे नाराज़ होकर 24 नवंबर को बनासकांठा, वाव-थराड, पाटण, मेहसाणा और अरवल्ली जिलों में पुलिस परिवारों ने विरोध प्रदर्शन किए, मेवानी से इस्तीफा और माफी की मांग की। 25 नवंबर को थराड में व्यापारियों ने भी दुकानें बंद कर पुलिस के समर्थन में रैली निकाली। बाद में मेवानी ने वीडियो में कहा, “ईमानदार पुलिस को सलाम, लेकिन ड्रग्स से कमाने वाले अधिकारियों के पट्टे तो उतारने ही चाहिए!” यह घटना दिखाती है कि पुलिस और राजनीति के बीच का उलझा माहौल ही शराबबंदी के अमल को मजाक बना रहा है।
दूसरा ये की सप्लाई और डिमांड का अर्थशास्त्र। जहां तक मांग है, वहां तक सप्लाई आएगी ही। गुजरात की अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ रही है, युवाओं की आय बढ़ी है, पार्टी कल्चर बढ़ा है। लेकिन कानूनी रूप से शराब नहीं मिलती तो लोग महंगी और खतरनाक शराब खरीदने को तैयार हो जाते हैं। इसलिए बूटलेगर्स का धंधा चमकता है। तीसरा यह की नीति का अधूरा अमल। गुजरात में परमिट सिस्टम है, लेकिन वह बेहद सीमित और जटिल है। दिल्ली या हरियाणा की तरह नियंत्रित, कानूनी बिक्री की व्यवस्था नहीं है। इसलिए लोग काले बाजार की ओर मुड़ते हैं।
एक ओर तो शराबबंदी को सख्ती से लागू करने के लिए पुलिस और आबकारी विभाग में बड़े सुधार, भ्रष्टाचार-विरोधी कार्रवाई और टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल (ड्रोन निगरानी, इंटेलिजेंस नेटवर्क) करना चाहिए। लेकिन दूसरी ओर हकीकत यह है कि पूर्ण शराबबंदी अब अव्यवहारिक हो चुकी है।
दुनिया के कई देशों में पूर्ण प्रतिबंध से काला कारोबार बढ़ा, सरकारी आय घटी और बुटलेगर और माफिया मज़बूत हुए। गुजरात को भी अब नीति की समीक्षा करनी चाहिए। शराबबंदी जारी रखनी है तो उसे सचमुच लागू करना पड़ेगा, वरना नियंत्रित, कानूनी और पारदर्शी बिक्री की व्यवस्था करनी पड़ेगी – ताकि राज्य को भारी राजस्व मिले और जहरीली शराब से होने वाली मौतें रुकें।
जब तक इनमें से कोई एक ठोस कदम नहीं उठाया जाएगा, तब तक गुजरात की शराबबंदी एक मज़ाक बनी रहेगी और लोगों की जान से खेल जारी रहेगा। समय आ गया है कि इस नीति को फिर से सोचकर नया स्वरूप दिया जाए वरना इतिहास हमें माफ नहीं करेगा।
जब तक इनमें से कोई एक ठोस कदम नहीं उठाया जाएगा, तब तक गुजरात की शराबबंदी एक मज़ाक बनी रहेगी?
– राजेशराठौर
संपदक, गुजरातन्यूज़पोस्ट